पुष्पराजग़ढ(अनूपपुर)-गुरु पूर्णिमा है बिशेषकृष्ण द्वैपायन व्यास जी का जन्मदिवस है, इसलिए इस तिथि को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। आज हमारे पास सनातन के नाम से जो भी शास्त्र धरोहर के रूप में वेद पुराण आदि हैं, वे सब वेद व्यास जी की ही कृपा से हैं, जिनके अध्ययन मनन अनुशीलन परशीलन से आज के आचार्य गुरु पद की गरिमा को बनाए हुए हैं।
प्रवीण चन्द्रवंशी की रिपोर्ट
गुरु वह तत्त्व है जो हमारी दिशा और दशा बदलकर परमतत्त्व से साक्षात्कार का साधन उपलब्ध कराते है। गुरु पद का अर्थ ही है अन्धकार दूर कर जीव को प्रकाशित कर दे। हम सबकी प्रथम गुरु माता है, जो पिता सहित संसार से हमारा परिचय कराती है। भगवान शिव आदि गुरु हैं, श्री कृष्ण जगत गुरु हैं ‘कृष्णं वन्दे जगत गुरुम’ और श्री हनुमान जी गुरु की पदवी तो नहीं पसंद करते किन्तु वे कृपा में गुरु ही हैं। “जै जै हनुमान गुसाईं कृपा करहु गुरुदेव की नाई।” दत्तात्रेय भगवान् ने तो 24 गुरु माने हांथी से लेकर मधुमक्खी तक। हम भी जिनसे सीखते हैं, वह गुरु ही होते हैं। आज के युग में योग्य गुरुओं की नहीं योग्य शिष्यों की कमी है। योग्य शिष्य को गुरु स्वयं खोजते हैं। जैसे विश्वामित्र जी ने राम- लक्ष्मण को खोजा, महावतार बाबा ने लाहिड़ी महाशय को, स्वामी राम कृष्ण परमहंस ने नरेन्द्र को। गुरु शिष्य की अमरता के लिए द्रोणाचार्य बनकर कलंक भी अपने शिर ले लेते हैं तभी तो उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश से भी बढ़कर परब्रह्म का पद मिला हुआ है। गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुदेवो महेश्वर गुरु साक्षात्त परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।।” आप सभी के जीवन में भी गुरु तत्व का प्रवेश हो इन्ही शुभकामनाओं के साथ इस पावन पर्व पर सभी गुरुजनों को कोटिशः प्रणाम।


