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पिता के मृत्यु प्रमाण पत्र बनबाने पुत्र लगा रहा सरकारी दफ्तरों के चक्कर

By Rohit Kumar Ojha

शाढ़ौरा देवेश ओझा

एक माह भटकने के बाद भी नहीं हुई गरीब नाबालिग की सुनवाई

शाढ़ौरा। कोरोना महामारी का सेकेंड वेव कस्बे में इस तरह कहर बन कर आया कि इसने तमाम लोगों की जिंदगी को असमय ही निगल लिया। कई परिवार अपनों को खोकर तबाह हो गए। इसी तरह यहां रहने वाले रतनलाल कुशवाह की मौत भी पिछले अप्रेल माह में कोरोना संक्रमण के कारण जिला चिकित्सालय में इलाज के दौरान हो गई थी। पिता की मौत का दर्द झेल रहा 17 वर्षीय बिक्की मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए पिछले एक माह से सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहा है लेकिन दिन दिन भर गुहार लगाते हुए भटकने के बाद भी अभी तक उसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई है। दरअसल पिछले माह अप्रैल में रतन लाल ने कोरोना का वेक्सीन लगवाया था इसके बाद उसको हल्का बुखार आया था इसी दरम्यान उसे कोरोना संक्रमण हो गया। कुछ दिन बाद 19 अप्रैल को तबियत बिगड़ने पर उसके पुत्र द्वारा स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र लाया गया जहां डॉक्टरों ने उनकी गंभीर हालत को देखते हुए जिला चिकित्सालय रेफर कर दिया। कोविड-19 एंबुलेंस द्वारा उसे जिला चिकित्सालय कोविड-19 सेंटर ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने तत्काल उपचार शुरू किया इस दौरान उसकी एंटीजन कार्ड से जांच भी की गई जो पोजिटिव आई थी उपचार के करीब एक घंटे बाद उसे मृत घोषित कर दिया। पॉजिटिव होने से कोविड-19 की पूरी प्रक्रिया के साथ मृतक का अंतिम संस्कार अशोकनगर मुक्तिधाम में किया गया। इस दौरान मुक्तिधाम में पंजीकरण भी कराया गया था। इसके बाद परिजन शाढ़ौरा अपने घर आ गये वहीं डॉक्टरों ने परिजनों को होम क्वारन्टाइन कर दिया गया। मृतक के 17 वर्षीय नाबालिग पुत्र विक्की ने अपने पिता के मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए आवेदन दिया लेकिन पिछले एक माह से कई बार जिला चिकित्सालय में सुबह से शाम तक चक्कर लगाने के बाद भी उसको अपने पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं मिल पा रहा है। उसके बताए अनुसार जिला चिकित्सालय में उसे बताया जाता है की यहां पर मृतक का कोई पंजीयन ही नहीं है। मुक्तिधाम में बताया जाता है कि हमने जो पंजीयन किया था वह नगर पालिका अशोकनगर में भेज दिया है। वहीं नगर पालिका में पहुंचने पर बताया जाता है कि आपका पंजीयन यहां नहीं है आप जिला चिकित्सालय में जाएं वहां से ही आपके पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र बनेगा। इस तरह नाबालिग विक्की दर दर की ठोकरें खाते हुए इधर से उधर फिर रहा है परंतु इतना समय बीत जाने के बाद भी उसे अपने पिता के मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं हो सका है। अब यदि जिला चिकित्सालय में मृतक का कोई लेखा जोखा नही है तो फिर क्या यह माना जाए कि जिला चिकित्सालय ने किसी और का अंतिम संस्कार मृतक रतनलाल के परिजनों से करा दिया। या फिर आंकड़ों को छुपाने के लिए उसे कोरोना संक्रमित नहीं मान कर प्रमाण पत्र नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में आसानी से सोचा जा सकता है कि उस गरीब परिवार को शासन की योजनाओं का लाभ या राहत कैसे मिल सकेगी और घर के मुखिया की मौत के बाद बिना किसी मदद व राहत के कैसे इस परिवार की गाड़ी आगे चल सकेगी।

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