पन्ना जिल के पवई की प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों एक ऐसे सवाल के घेरे में है, जिसका जवाब शायद सरकारी फाइलों से भी नहीं मिल रहा। मामला एक SDM की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रही शिकायतों का है। बताया जाता है कि आम जनता ने हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन दिया। अधिवक्ता संघ भाजपा मंडल अध्यक्ष और अन्य समाज की ओर से भी शिकायतों का सिलसिला चल पड़ा, और सबसे दिलचस्प बात यह कि पवई के भाजपा विधायक प्रह्लाद सिंह लोधी ने भी प्रभारी मंत्री इंदर सिंह परमार को पत्र लिखकर पवई SDM समीक्षा जैन के स्थानांतरण/उचित कार्रवाई की मांग की है।
अब सवाल यह नहीं कि शिकायत किसने की? सवाल यह है कि जब जनता से लेकर सत्ता पक्ष तक की आवाज एक दिशा में सुनाई दे रही है, तो शासन की सुनवाई आखिर किस दिशा में हो रही है? सरकार अपनी, विधायक अपने… फिर SDM किसका?? राजनीतिक गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि सरकार में जनता की बात जनप्रतिनिधियों के माध्यम से ऊपर तक पहुंचती है। लेकिन पवई का मामला यदि शिकायतकर्ताओं के दावों के अनुसार देखा जाए तो तस्वीर कुछ उलटी नजर आती है। क्या SDM साहिबा का रसूख इतना प्रभावशाली है कि सत्ता पक्ष की आवाज भी उनके कार्यालय की चौखट से आगे नहीं जा पा रही? या फिर शासन की व्यवस्था में कोई ऐसा ‘अदृश्य कवच’ है, जिसके सामने शिकायत, ज्ञापन और सिफारिश सब निष्प्रभावी हो जाते हैं? जनता की शिकायत भी ‘पेंडिंग केस’! आम नागरिक अगर राजस्व न्यायालय में अपने प्रकरण के लिए तारीख मांगता है तो उसे तारीख मिलती है। कभी अगली तारीख, कभी उसके बाद वाली तारीख। अब जनता पूछ रही है- क्या SDM के खिलाफ शिकायत पर भी तारीख मिलेगी? अगर हां, तो अगली तारीख कब? और उसके बाद वाली तारीख? या फिर कार्रवाई की फाइल भी उसी राजस्व न्यायालय की तरह ‘सालों से लंबित’ रहने वाली है? बात सिर्फ यह नहीं कि किसी अधिकारी को दोषी घोषित किया जाए, बल्कि इसलिए कि शिकायतों की बढ़ती संख्या के बीच निष्पक्ष जांच और स्पष्ट निर्णय का अभाव अपने आप में बड़ा सवाल बनता जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल- ‘सत्ता’ कमजोर है या ‘अफसरशाही’ मजबूत? लोकतंत्र में अधिकारी शासन के प्रति जवाबदेह होते हैं और जनप्रतिनिधि जनता के प्रति। लेकिन यदि सत्ता पक्ष के विधायक द्वारा भी किसी अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की जाती है और उसके बावजूद कोई स्पष्ट प्रशासनिक निर्णय सामने नहीं आता, तो स्वाभाविक रूप से चर्चा शुरू होती है कि आखिर पवई में किसकी चल रही है- सरकार की, जनप्रतिनिधियों की या फिर अफसरशाही की?अगर विधायक की बात भी नहीं सुनी जा रही, तो आम आदमी की उम्मीद किस दरवाजे पर दस्तक दे? और यदि विधायक की बात सुनी जा रही है, तो फिर निर्णय दिखाई क्यों नहीं दे रहा? अब जवाब चाहिए सिर्फ पावती नहीं। पवई की जनता को किसी अधिकारी के विरुद्ध पूर्वाग्रह नहीं चाहिए। जनता को चाहिए निष्पक्ष जांच। यदि शिकायतें गलत हैं तो शासन स्पष्ट करे। यदि शिकायतों में तथ्य हैं तो कार्रवाई करे। और यदि मामला जांच योग्य है तो निष्पक्ष जांच कराए। लेकिन मौन प्रशासनिक व्यवस्था जनता के सवालों को और बड़ा बनाती जा रही है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती जब जनता सवाल पूछती है… सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है, जब सवाल पूछने वालों की संख्या बढ़ती जाए और जवाब देने वाला कोई दिखाई न दे। पवई में फिलहाल यही सवाल हवा में तैर रहा है। जब जनता भी खिलाफ, संगठन भी खिलाफ और सत्ता पक्ष का विधायक भी कार्रवाई की मांग कर रहा हो… तो फिर SDM साहब के पक्ष में आखिर कौन-सी अदृश्य ताकत खड़ी है? अब देखना यह है कि पवई की यह ‘पेंडिंग फ़ाइल’ कब अपने निष्कर्ष तक पहुंचती है