जावरा। केरवासा क्षेत्र के किसान अब अश्वगंधा की औषधीय फसल लगाकर खेती को लाभ का धंधा बनाने में लगे हैं!

नागेश्वर धाकड की रिपोर्ट
ग्राम केरवासा के 6 किसानों ने पहली बार अश्वगंधा लगाई है, अब इसके पत्ती,बीज,और कंद सभी मंडी में बेचकर मुनाफा कमाएंगे,फसल पककर तैयार हो गई,किसान इसको नीमच, या रामगंज मंडी में बेचेंगे!जावरा मुख्यालय से 12 किमी दूर ग्राम केरवासा में इन 6 किसानो ने करीब तीन हेक्टेयर में लगाई अश्वगंधा की ओषधीय फसल ऊकारलाल वाक्तरिया , बिहारीलाल सेकवाडिया,भेरूलाल पांचाल, कमलेश नायमा, बसंतिलाल धाकड़, विजेंद्रसिह राठौड़,इन किसानों का कहना है कि निमच मंडी में लहसुन बेचने के लिए गए थे,,अश्वगंधा फसल के अच्छे भाव सुने तो इस फसल के बारे में जानकारी ली और फिर वही से बीज लेकर आए, नवंबर में बीज को खेत में फुककर, (बुवाई)कर दी थी,अब फसल पककर तैयार हो गई,और मंडी में बेचने की तैयारी में है।इसको दो प्रकार से बोवनी कर सकते हैं।
एक तो सीधे खेत में 1 बीघा में 4 किलो बीज डालकर ,तथा दूसरी रोपनी तेयार करके प्रत्येक पोधे की दूरी करीब आधा फीट होना चाहिए।फसल कड़वी होने से कीटनाशक छिटकने की जरूरत नहीं पड़ती और ना ही जानवर इसे नुकसान पहुंचाते है। फसल का ओषधीय उपयोग होने से मंडियों में अच्छी डिमांड है।एक बीघा फसल में करीब 2 से 3 क्विंटल कंद (डंठल) निकलते हैं,मंडी में यह 15 से 30 हजार रुपए प्रति क्विंटल के भाव क्वालिटी अनुसार बिकते है, बीज चार हजार रुपए प्रति क्विंटल बिकता है, और एक बीघा में एक क्विंटल से अधिक बीज निकलता है, पत्तिया भी सहेजकर रखे तो इनकी भी मंडी में डिमांड हे, सभी खर्चे को काटकर प्रति बीघा 60 हजार रुपए तक का मुनाफा मिलता है।चार से पांच बार सिंचाई करना पड़ती है,छह माह में फसल पककर तैयार हो जाती है।


