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गढाकोटा मे 1857 से लगातार निकल रही है रथयात्रा, 12 जुलाई को निकलेगी रथयात्रा

वैध ने टटोली 'भगवान' की नब्ज

संवाददाता – रवि सोनी

गढाकोटा। 1857 का वर्ष भारत के इतिहास मे जहां अपना विशिष्ट स्थान रखता है जब संपूर्ण देश ने अग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई एकजुट होकर शुरु की थी वहीं इसी सन मे गढाकोटा मे नई धार्मिक परंपरा ने भगवान श्री जगदीश स्वामी की रथ यात्रा के रूप मे जन्म लिया था।
रवि सोने गढाकोटा। देश के इतिहास मे भले ही बीते समय की बात हो चुकी हो लेकिन गढाकोटा के इतिहास मे इसके वर्तमान स्वरूप के दर्शन आज भी प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की दोज को भगवान श्री जगन्नाथ स्वामी, श्री बलदाऊ भैया जी ओर माता सुभद्रा की पावन रथयात्रा निकलने का सिलसिला अनवरत चल रहा है।लगभग ढाई सौ वर्ष से अधिक जिस धार्मिक परंपरा का तीर्थ स्थल पटेरिया जी से प्रथम बार इस रथयात्रा का आयोजन किया गया था।
वह आज भी लाखों लोगों की श्रृंद्धा एवं आस्था का प्रतीक माना जाता है जहां लोग प्रतिवर्ष इस आयोजन में पूरी श्रृंद्धा एवं भक्ति से शामिल होने दूर-दूर से पधारते हैं और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं धर्म से जुड़े लोगो का मानना है कि जो लोग भगवान जगन्नाथ स्वामी की रथ यात्रा में पुरी (उड़ीसा) नहीं पहुंच पाते वे गढाकोटा की रथयात्रा मे शामिल होकर पुण्य लाभ अर्जित करते है।
पटेरिया तीर्थ स्थल का अपना धार्मिक इतिहास रहा है जिसकी स्थापना सिद्ध बाबा महराज द्वारा की गई थी। उन्ही की कृपा से इस क्षेत्र में पुण्य सलिल नर्मदा मैया के प्राकृटय की भी किवदंती जुड़ी हुई है जो आज सिद्ध बाबा मंदिर के समीप ही लोंग झिरिया के रूप मे जानी जाती है कालांतर में इस क्षेत्र की महिमा प्रसिद्धि एवं प्रताप से लाभान्वित होकर अनेक लोगों ने इस धर्म क्षेत्र के विकास में अपना सहयोग प्रदान किया था जिनमें अंग्रेजों से लेकर मुस्लिम भाई तक शामिल थे
जब 1857 मे प्रथम बार महंत जानकीदास के मार्गदर्शन मे आस्थाई रथ पर तीनों मूर्तियां भगवान जगन्नाथ,बलदाऊ भैया ओर मां सुभद्रा जी को विराजमान कर आयोजन किया गया था तो इसके माहत्म से प्रभावित होकर अगले वर्ष 1858 मे एक मुस्लिम थानेदार ने स्थाई रथ का निर्माण करवाया था। जो धार्मिक सौहार्द का अभूतपूर्व उदाहरण था तब इसी वर्ष से इस रथ यात्रा का आयोजन पटेरिया मंदिर से गनपत खंताल (नायक) के बाजार वार्ड स्थित जनकपुरी मंदिर तक किया जाना लगा।इसके बाद महंत रामसेवक दास के कार्यकाल मे दो अन्य रथो का निर्माण कराया गया। जगन्नाथ पुरी धाम के समान ही तीनों रथों पर तीनों श्री मूर्तियों की रथयात्रा आयोजित की जाने लगी। इस भव्य समारोह की तैयारीयां ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा से प्रारंभ होती है जब तीनों देव प्रतिमाओं को श्रृंद्धालुओं के दर्शनार्थ मंदिर में बाहर स्थापित किया जाता है एक धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ स्वामी अस्वस्थ हो जाते हैं जो पूर्णिमा से प्रतिपदा तक एक वैध भगवान के अस्वस्थ होने पर इलाज हेतु मंदिर जाते हैं पूर्व मे वैध पं कालीचरण तिवारी भगवान का इलाज करते थे।अब उनके वंशज पं अम्बिकाप्रसाद तिवारी भगवान का इलाज करते है एकादशी को भगवान को दवा दी जाती है जिसमे औषधि के रूप जड़ो का पानी ओर दाल का पानी भगवान को सेवन के दिया जाता है वही प्रतिपदा को भगवान जगन्नाथ स्वामी को दाल – चावल मिश्रित, खिचड़ी का सेवन कराया जाता है इसके अगले दिन दोज को मंदिर मे मालपुये तथा पुड़ी सहित छप्पन भोग दिया जाता है उसी दिन भगवान जगन्नाथ स्वामी की नगर यात्रा निकाली जाती है साथ ही श्रृद्धालुओं को शुद्ध घी से बने मालपुये ओर पुड़ी का प्रसाद दिया जाता है।
धार्मिक मान्यताओ के अनुसार यह है किवदंती
स्कंदपुराण के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न के पूछने पर महर्षि जैमिनी ने भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाले तथा धर्म, अर्थ,काम ओर मोझ को प्रदान करने वाले बारह यात्रा उत्सवो का विवरण राजा को सुनाया।भगवान श्रीकृष्ण ने रथयात्रा को सभी यात्राओ मे श्रेष्ठ बताया है ओर कहा है कि पुष्प नक्षत्रयुक्त अषाढ़ शुक्ल द्वितिया के दिन मेरे साथ सुभद्रा ओर बलराम सहित रथयात्रा मे बैठाकर यात्रा कराने वालो के सभी मनोरथ पूर्ण होते है। इसी मान्यता के मद्देनजर गढाकोटा में भी जगन्नाथ रथयात्रा का महोत्सव आयोजित किया जाता है जो पटेरिया तीर्थ से शुरू होती है रथयात्रा के समय आगे बलराम जी बीच मे सुभद्रा जी ओर सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ जी का रथ होता है जहां रास्ते मे लोगो द्वारा जगह – जगह भगवान का स्वागत किया जाता है संपूर्ण नगर भगवान के स्वागत मे दुल्हन कि तरह लोगो द्वारा सजाया जाता है जगह जगह बंदन वारे लगाये जाते है अंत मे खंदाल परिवार के परिजनों द्वारा गांजे बाजे के साथ भगवान की आगवानी की जाती है ओर मिर्चवानी कर भगवान का स्वागत कर बाद मे बाजार वार्ड स्थित जनकपुरी मंदिर मे तीनो रथ पहुंचते है जहा तीनो रथो की महा आरती की जाती है ओर भगवान जगन्नाथ स्वामी,सुभद्रा मैया ओर बलदाऊ भैया चौदह दिन रहते है।
यह भी मान्यता है कि रथयात्रा महोत्सव मे रथारूढ़ भगवान जगन्नाथ स्वामी के दर्शन मात्र से ही मनुष्य जन्म मृत्यो के बंधन से मुक्त हो जाता है इसके पूर्व भगवान जगन्नाथ प्रजा की नजरो मे बीमार होते है ओर आषाढ़ शुक्ल परमा को खिचड़ी का प्रसाद दिया जाता है रात बारह बजे भगवान पूरी तरह स्वस्थ्य हो जाते है ओर उनका श्रृगांर किया जाता है फिर महा आरती कर छप्पन भोग लगाया जाता है ओर आषाढ दोज के दिन सभी तीर्थों का जल लाकर भगवान का विशेष अभिषेक किया जाता है ओर हवन यज्ञ,महाप्रसाद,भंडारा भोग पूजन के बाद शाम को रथयात्रा का आयोजन होता है जिसमे जगन्नाथ मंदिर के महंत हरिदास जी के साथ साधु संतो ओर महंतो के साथ क्षेत्रीय विधायक व मध्यप्रदेश शासन मे पीडब्ल्यूडी मंत्री गोपाल भार्गव भगवान जगन्नाथ स्वामी के विग्रह स्वरूप को रथो पर विराजमान कर यात्रा का शुभारंभ करते है ओर जगन्नाथ के भात को जगत पसारे हाथ…. जय जगदीश जय जगदीश के घोष के बीच रथ यात्रा शुरू हो जाती है।

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